
हैल्थ ऑफ नेशन 2026, द कंप्लीट पिक्चर डीकोडेड
Bilaspur 7 अप्रैल, 2026: आज जारी हुई अपोलो हॉस्पिटल की हैल्थ ऑफ द नेशन 2026 (एच.ओ.एन 2026) रिपोर्ट के छठवें संस्करण के अनुसार भारत में स्वास्थ्य की आम समस्याएं ज्यादा जल्दी हो रही हैं। वो शरीर में ज्यादा लंबे समय तक रहती हैं। यह रिपोर्ट अपोलो के परिवेश में साल 2025 में कराए गए तीन मिलियन प्रिवेंटिव हैल्थ चेकअप के नतीजों पर आधारित है, जो प्रोएक्टिव हैल्थकेयर पर जोर देती है, ताकि लोगों को बीमारियों की रोकथाम से आगे बढ़कर अपने स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और सबसे अधिक सेहतमंद बने रहने में मदद मिले।
भारत में स्वास्थ्य का परिदृश्य लगातार बदल रहा है। आज हर तीन में से दो व्यस्कों को एनसीडी का जोखिम है। काम करने वाली आबादी में लगभग आधे लोगों को प्रीडायबिटीज़ या डायबिटीज़ है, हर 10 में से 8 लोगों का वजन बहुत अधिक है, जिससे जीवनशैली में सुधार की गुंजाईश स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होती है। महिलाओं के जोखिम अलग होते हैं, जिनमें एनेमिया और कम उम्र में स्तन कैंसर होना शामिल है। विटामिन डी और बी12 की ज्यादा कमी तथा कम होती फिटनेस से प्रदर्शित होता है कि स्वास्थ्य के जोखिम कितने बड़े हो चुके हैं। ये जोखिम महिलाओं और पुरुषों, अलग-अलग उम्र के लोगों और अलग-अलग जीवनशैली के अनुरूप अलग-अलग होते हैं। इसलिए स्वास्थ्य की स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए जरूरी है कि बीमारी के लक्षणों को नहीं, बल्कि यह किस व्यक्ति को हुई है, उस पर अधिक गौर किया जाए।
दिल्ली-एनसीआर में जिन लोगों ने जाँच कराई गई, उनके डेटा से सामने आया कि 17 प्रतिशत लोगों को डायबिटीज़, 19 प्रतिशत लोगों को हाईपरटेंशन और 23 प्रतिशत लोगों को एनेमिया है। साथ ही, 81 प्रतिशत लोगों में मोटापा पाया गया। ये नतीजे स्वास्थ्य के मामले में लक्ष्य पर केंद्रित रणनीति और सामुदायिक सहयोग की जरूरत प्रदर्शित करते हैं, ताकि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्वास्थ्य की इन बड़ी चुनौतियों से निपटा जा सके।
डॉ. प्रताप सी. रेड्डी, फाउंडर चेयरमैन, अपोलो हॉस्पिटल्स ने कहा, ‘‘कोई भी देश तभी ताकतवर होता है, जब वहाँ के नागरिक स्वस्थ हों। लंबे समय से बीमारी से बचने के लिए किया जाने वाला हैल्थ चेकअप केवल खून और वाईटल्स के नियमित परीक्षण पर आधारित रहा है। लेकिन आज एक बड़ा बदलाव देखने में आ रहा है। स्वास्थ्य एक व्यक्तिगत, प्रोएक्टिव और बहुत सटीक मामला है। कोई भी दो लोग समान नहीं होते हैं, इसलिए रोकथाम का दृष्टिकोण भी हर व्यक्ति के लिए अलग होता है। विज्ञान की सीमाएं बढ़ रही हैं। इसमें पेट में माईक्रोबायोम हैल्थ से लेकर एडवांस्ड दीर्घकालिक रिस्क पैटर्न शामिल हो रहे हैं क्योंकि विस्तृत स्वास्थ्य जाँच खुद की देखभाल करने का सबसे बेहतर तरीका है।’’
युवा और कामकाजी आबादी में स्वास्थ्य के जोखिम पहले से मौजूद हैं, भले ही इनके लक्षण प्रकट न होते हों।
हमारे डेटा में 30 साल से कम उम्र के हर 5 से एक व्यक्ति प्रीडायबिटिक है। इस स्टेज में भी स्वस्थ होना संभव है। जिन लोगों ने इसका इलाज कराया, उनमें से 28 प्रतिशत फिर से सामान्य हो गए। 50 साल से अधिक उम्र के केवल 7 प्रतिशत लोग ही ठीक हुए।
आधे से अधिक लोगों को मोटापा था और आधे से अधिक लोगों में कोलेस्ट्रॉल असामान्य पाया गया।
हर 10 में से लगभग 7 लोगों में विटामिन डी कम पाया गया और लगभग आधे लोगों को विटामिन बी12 की कमी थी।
30 साल से कम उम्र के लगभग दो-तिहाई लोगों में शक्ति, सामर्थ्य और संतुलन की कमी पाई गई। शारीरिक कार्य करने की कम क्षमता के कारण आर्टरीज़ कठोर हो सकती हैं, गिरने का जोखिम बढ़ सकता है और आयु कम हो सकती है। इसके लक्षण महसूस होने से काफी पहले ही स्थिति बिगड़ चुकी होती है।
अपोलो शाईन फाउंडेशन द्वारा 20,164 विद्यार्थियों (17 से 25 साल) पर की गई जाँच में सामने आया कि हर तीन में से दो विद्यार्थियों को स्वास्थ्य का कम से कम एक जोखिम था।
कामकाजी आबादी में (औसत उम्र 38 साल):
हर 10 में से 8 लोगों का वजन बहुत अधिक था।
लगभग आधे लोगों को प्रीडायबिटीज़ या डायबिटीज़ थी।
हर चार में से एक का ब्लड प्रेशर अधिक था।
ये नतीजे प्रदर्शित करते हैं कि युवा और कामकाजी आबादी में जोखिम पहले से मौजूद है, भले ही इसकी क्लिनिकल पहचान काफी समय बाद हो।
डॉ. प्रीता रेड्डी, एग्ज़िक्यूटिव वाईस चेयरमैन, अपोलो हॉस्पिटल्स ने कहा, ‘‘महिलाओं का स्वास्थ्य पूरे परिवार, समुदाय और अर्थव्यवस्था को शक्ति प्रदान करता है। अनुमानों के मुताबिक महिलाओं को स्वस्थ रखकर साल 2040 तक विश्व की अर्थव्यवस्था में 1 ट्रिलियन डॉलर प्रतिवर्ष की बढ़ोत्तरी की जा सकती है। लेकिन हमारे आँकड़ों के अनुसार भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य का एक बड़ा भार है, जो अक्सर नजरंदाज हो जाता है।
अपोलो में हम महिलाओं के स्वास्थ्य को केवल राष्ट्र की प्राथमिकता ही नहीं, बल्कि अपनी एक साझा जिम्मेदारी भी मानते हैं। इसकी शुरुआत केयर को एक व्यक्तिगत नजरिए से देखने से होगी। वह नजरिया, जो महिलाओं के जैविक विज्ञान, जीवन के चरण और रिस्क प्रोफाईल के साथ तालमेल में हो। सैल्फ-केयर कोई विशेष सुविधा नहीं, बल्कि एक ताकत है। ऐसी ताकत जो एक ज्यादा स्वस्थ, मजबूत व समृद्ध भारत का निर्माण करेगी।’’
विभिन्न आबादियों में स्वास्थ्य का जोखिम अलग-अलग होता है; सामान्य जाँच में लक्षणों के बिना ही बीमारी की पहचान होती है।
महिलाओं में रिस्क पैटर्न अलग होता है। उन्हें एनेमिया और उम्र के साथ पे टपर बढ़ते मोटापे का जोखिम होता है।
अपोलो के डेटा के मुताबिक रूटीन मैमोग्राफी में स्तन कैंसर पाए जाने की औसत उम्र 51 साल है, जो पश्चिमी देशों की आबादी के मुकाबले लगभग दस साल पहले है। यानी भारत में स्तन कैंसर कम उम्र में ही हो जाता है। इसलिए जाँच भी कम उम्र से शुरू होनी चाहिए।
40 साल से अधिक उम्र की 359 महिलाओं में से एक महिला को स्तन कैंसर पाया गया और इन सभी मामलों में कोई भी लक्षण प्रकट नहीं हुआ।
इससे प्रदर्शित होता है कि स्वास्थ्य का जोखिम एक सा नहीं होता है। इसलिए योजनाबद्ध जाँच से बीमारी की पहचान जल्दी हो सकती है।
कुछ बीमारियों की जल्दी पहचान करने के लिए इमेजिंग और एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स जरूरी है।
जिन लोगों में अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर निकलकर आया, उनमें से 74 प्रतिशत में लिवर एंजाईम का स्तर सामान्य पाया गया।
कोरोनरी कैल्सियम स्कोरिंग करवाने वालों में 45 प्रतिशत में अरली एथरोस्क्लेरोसिस पाया गया, जबकि इनमें से किसी में भी कोई भी लक्षण दिखाई नहीं दे रहा था।
स्वस्थ लोगों के पेट में ज्यादा तरह के बैक्टीरिया पाए गए। जैसे-जैसे डायबिटीज़, मोटापे और उच्च कोलेस्ट्रॉल बढ़े, ज्यादा बीमारियों वाले लोगों के पेट में बैक्टीरिया की विविधता 9 प्रतिशत कम हो गई। आपका पेट मेटाबोलिक समस्याएं होने से पहले ही उन्हें प्रकट कर देता है।
ये परिणाम प्रदर्शित करते हैं कि कुछ बीमारियों की पहचान केवल खून के परीक्षण से नहीं हो पाती है।
डॉ. संगीता रेड्डी, जॉईंट मैनेजिंग डायरेक्टर, अपोलो हॉस्पिटल्स ने कहा, ‘‘लंबा और सेहतमंद जीवन किस्मत से नहीं मिलता है, बल्कि इसमें लिए लगातार मेहनत करना जरूरी है। सही समय पर स्वास्थ्य की सही जाँच से हृदय रोग और कैंसर की पहचान पहले चरण में ही हो सकती है, जब उनका इलाज सबसे अधिक आसान होता है।’’
हैल्थकेयर का भविष्य आबादी के डेटा, भौगोलिक जानकारी और जीवनशैली एवं एपिजेनेटिक्स की भूमिका द्वारा बीमारी के पूर्वानुमान पर आधारित होगा। अपोलो प्रोहैल्थ में प्रेडिक्टिव रिस्क असेसमेंट, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और फिज़िशियन द्वारा जाँच के माध्यम से महिलाओं और पुरुषों, दोनों के लिए उम्र व रिस्क प्रोफाईल के आधार पर सेवा दी जाती है।
भारत में अब हमें लक्षणों पर आधारित केयर की बजाय प्रेडिक्टिव, निरंतर और व्यक्तिगत केयर की ओर बढ़ना होगा। अपने स्वास्थ्य की जाँच को टालें नहीं। आज की हैल्थ चेकअप कराएं।’’
इस रिपोर्ट में डेटा का स्थिर पैटर्न सामने आया। स्वास्थ्य के विभिन्न जोखिमों को लक्षण दिखने से पहले ही पहचाना जा रहा है। इससे प्रदर्शित होता है कि फौलो-अप और लगातार केयर से बेहतर नतीजे मिलते हैं। हाई ब्लड प्रेशर के 56 प्रतिशत और डायबिटीज़ के 34 प्रतिशत मामलों में डॉक्टर द्वारा बताई गई केयर का पालन करने से सुधार आया। अगर हैल्थ चेकअप में कोई समस्या सामने आती है, तो तुरंत उसका उपाय करके उसे ठीक कर दिया जाता है।
देश का स्वास्थ्य 2026
राज्यवार और शहरवार स्वास्थ्य जांच के आंकड़े
छत्तीसगढ़
· मधुमेह: 27.9% लोग मधुमेह से पीड़ित हैं
· उच्च रक्तचाप: 26.1% लोगों में उच्च रक्तचाप का निदान हुआ है
· एनीमिया: 25.3% लोग एनीमिया से ग्रस्त पाए गए, जो पोषण संबंधी कमियों, विशेष रूप से आयरन युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन की कमी को दर्शाता है।
· मोटापा और अधिक वजन: 79.3% लोग मोटापे से ग्रस्त हैं
· वसा की कमी: 57.9% लोगों में वसा की कमी पाई गई, जो पोषण संबंधी कमियों, विशेष रूप से आयरन युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन की कमी को दर्शाता है।
बिलासपुर:
• मधुमेह: जांच में शामिल 34.3% लोग मधुमेह से ग्रसित पाए गए।
• उच्च रक्तचाप: 29.0% लोगों में उच्च रक्तचाप का निदान हुआ।
• एनीमिया: 30.2% लोग एनीमिया से ग्रसित पाए गए।
• मोटापा: 81.0% लोग अधिक वजन वाले या मोटे पाए गए।
• डिसलिपिडेमिया: 73.0% लोगों में लिपिड का स्तर असामान्य पाया गया।
रायपुर:
• मधुमेह: जांच में शामिल 18.4% लोग मधुमेह से ग्रसित पाए गए।
• उच्च रक्तचाप: 23.7% लोगों में उच्च रक्तचाप का निदान हुआ।
• एनीमिया: 17.0% लोग एनीमिया से ग्रसित पाए गए।
• मोटापा: 78.0% लोग अधिक वजन वाले या मोटे पाए गए।
• डिसलिपिडेमिया: 38.1% लोगों में लिपिड का स्तर असामान्य पाया गया।
इस रिपोर्ट के नतीजे अपोलो के हॉस्पिटल्स, क्लिनिक्स, डायग्नोस्टिक लैब्स और वैलनेस सेंटर्स से मिले इलेक्ट्रॉनिक मेडिकल रिकॉर्ड, संरचनाबद्ध क्लिनिकल मूल्यांकनों, ए.आई आधारित रिस्क वर्गीकरण और फौलोअप डेटा से लिए गए हैं।
