“सजा के बाद भी चालू है कारोबार: सोम डिस्टिलरी प्रकरण में प्रशासनिक ढिलाई पर उठे सवाल”
भोपाल/इंदौर।
मध्यप्रदेश की चर्चित सोम डिस्टिलरी एक बार फिर सुर्खियों में है। देपालपुर के अपर सत्र न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध किए जाने के बावजूद भी डिस्टिलरी का लाइसेंस अब तक रद्द नहीं किया गया है। जबकि इसी मामले में शामिल आबकारी अधिकारी को सरकार ने सेवा से बर्खास्त कर दिया। यह विरोधाभास न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाता है, बल्कि सिस्टम की निष्पक्षता और जवाबदेही पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।
⚖️ न्यायालय का फैसला
देपालपुर जिला न्यायालय के अपर सत्र न्यायाधीश ने प्रकरण क्रमांक 21/2021 (आपरेतिक प्रकरण क्रमांक 565/11) में दिनांक 23 दिसंबर 2023 को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया था।
इस फैसले में उस समय की आबकारी उप निरीक्षक प्रीति गायकवाड़ और सोम डिस्टिलरी के निदेशकों को धारा 420, 468, 471 और 120B के तहत दोषी पाया गया।
न्यायालय ने सभी आरोपियों को तीन वर्ष के कठोर कारावास और ₹1000 के अर्थदंड से दंडित किया।
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🏛️ सरकार ने की अधिकारी पर कार्रवाई
इस निर्णय के बाद मध्यप्रदेश शासन ने आदेश क्रमांक 1/1/25/0001/2025 दिनांक 25 सितंबर 2025 जारी कर दोषी आबकारी अधिकारी प्रीति गायकवाड़ को सेवा से बर्खास्त कर दिया।
हालांकि, माननीय उच्च न्यायालय इंदौर ने 24 जनवरी 2024 को उनकी Execution of Sentence (सजा के पालन) को स्थगित किया था, लेकिन जब उन्होंने Conviction Suspension (दोष सिद्धि स्थगन) के लिए एप्लीकेशन नंबर 1968/2025 दायर की, तो 10 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी।
यानी कि दोष सिद्धि अब भी कायम है।
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🏭 फिर भी डिस्टिलरी के निदेशकों पर कार्रवाई नहीं
दिलचस्प पहलू यह है कि जिन धाराओं में आबकारी अधिकारी को दोषी पाया गया, उन्हीं धाराओं में सोम डिस्टिलरी के निदेशकों को भी समान सजा सुनाई गई थी।
इसके बावजूद, अब तक मध्यप्रदेश आबकारी अधिनियम 1915 की धारा 31(1)(d) के तहत डिस्टिलरी का लाइसेंस निरस्त नहीं किया गया।
डिस्टिलरी का संचालन यथावत जारी है, जिससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि सरकार और विभाग इस पर मौन क्यों हैं?
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❓ सिस्टम की निष्पक्षता पर प्रश्न
कानूनी दृष्टि से देखा जाए तो, जब डिस्टिलरी प्रबंधन का Conviction अब भी कायम है और Suspension of Conviction के लिए कोई आवेदन भी प्रस्तुत नहीं किया गया, तब लाइसेंस स्वतः निरस्त हो जाना चाहिए था।
लगभग दो वर्ष बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न होना इस बात का संकेत है कि या तो नियमों का पालन चयनित तरीके से किया जा रहा है, या फिर कुछ प्रभावशाली हितों को संरक्षण दिया जा रहा है।
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📢 जनता में बढ़ रही चर्चा
इस पूरे प्रकरण ने न केवल आबकारी विभाग की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि आमजन और राजनीतिक हलकों में भी चर्चा का विषय बन गया है कि –
“अगर एक दोष सिद्ध अधिकारी को बर्खास्त किया जा सकता है, तो उसी अपराध में दोषी पाए गए उद्योगपतियों पर कार्रवाई से परहेज़ क्यों?”
यह मामला अब शासन और न्यायपालिका दोनों के समक्ष एक बड़ी नैतिक परीक्षा बन गया है — क्या कानून सबके लिए समान रहेगा, या फिर आर्थिक ताकत और प्रभाव के आगे न्याय फिर झुका
